शिवलिंग क्या है? शिवलिंग का अर्थ क्या है-shivling

शिवलिंग, भगवान शिव द्वारा लोकहित के लिए रचा गया एक महायंत्र है. आभामंडल की सर्वोतम आकृति ही शिवलिंग की आकृति है. देवी देवताओ का आभामंडल उल्टे अंडे के आकार का होता है, जो की सर्वोतम आभामंडल आकार है. शिवलिंग आभामंडल और ऊर्जा चक्रो मतलब पंचतत्वो के उपचार का यंत्र है.

शिवलिंग एक मात्र ऐसा यंत्र है जो एक ही समय में नकारात्मक ऊर्जाए हटाने और सकारात्मक ऊर्जाए स्थापित करने मे सक्षम है. जब शिवलिंग पर दूध, शहद, घी और जल चढाया जाता है तो चढाने वाले की नकारात्मक ऊर्जाए शिवलिंग द्वारा हटा दी जाती है और सकारात्मक ऊर्जाए प्रदान की जाती है.

2-अध्यात्म के वैज्ञानिक जिन्हें पहले ऋषि कहा जाता था… आज रिसर्चर कहा जाता है. उन्होंने लम्बे शोध के बाद नकारात्मक उर्जाओं को हटाने के लिये शिवलिंग का सहारा लिया. shivling पर दूध भगवान शिव को खुश करने के लिये नही बल्कि अपनी उर्जाओं और शरीर के पंचतत्व को उपचारित करने के लिये चढ़ाया जाता है.शिवलिंग की जलहरी में बह रहे तरल पदार्थ ही चढ़ाने वाले की नकारात्मक उर्जायें लेकर बहते हैं;इसीलिए उन्हें न छुवें.परन्तु shivling के शिखर पर चढ़ी ठोस वस्तुओं को प्रसाद स्वरूप ग्रहण करें.

3-शिवलिंग पर चढ़ाये गये तरल पदार्थ सीधे नाली में बहा दिये जाते हैं. क्योंकि उनमें नकारात्मक उर्जायें बह रही होती हैं. जैसे ही हम शिवलिंग के पास जाते हैं, आभामंडल के भीतर शोधन क्रिया अपने आप शुरू हो जाती है. प्राकृतिक रूप से आभामंडल से नकारात्मक उर्जायें खींचकर जलहरी के जरिये उनकी ग्राउंडिंग कर दी जाती है. ताकि वे रुकावटी उर्जायें दोबारा लौटकर हमारे पास न आ सकें. शिवलिंग से बह रही चीजों को छूने भर से रोग व रुकावटें पीछे लग सकती हैं. क्योकी shivling से बहकर नाली में जा रहे दूध, पानी आदि हमारी नकारात्मक ऊर्जाओ को साथ लेकर बह रहै होते है, इनमें भयानक रेडिएशन से भी जादा खतरनाक नकारात्मकता होती है. इसे ना छूवें.

शिवलिंग पर दूध चढ़ाने के फायदे-


दूध में प्राकृतिक रूप से वायुतत्व व जलतत्व का शोधन करने की क्षमता होती है. दूध अनाहत चक्र और दूध में मिला पानी स्वाधिष्ठान चक्र की रुकावटी व बीमार उर्जाओं को अपने साथ लेकर शिवलिंग पर चला जाता है. शिवलिंग अपने प्राकृतिक गुण के तहत सभी नकारात्मक उर्जाओं को पाताल अग्नि में भेजकर भस्म कर देते हैं.जरूरत से ज्यादा दूध चढ़ाने से नकारात्मक उर्जायें खत्म होने के बाद भी दूध से बना उर्जाओं को लिंक अनाहत चक्र की उर्जायें निकालकर उन्हें शिवलिंग पर बहाता रहता है. ये बड़ा नुकसान है. इसलिये जितना बताया जाये, उतना ही दूध चढ़ायें, उसमें पानी जरूर मिला लें. इससे अतिरिक्त उर्जाओं के बह जाने का खतरा कम हो जाता है..


रुद्राभिषेक के समय अधिक दूध चढ़ने से भी नुकसान होता है? वास्तव में, रुद्राभिषेक विशुद्ध रूप से वैज्ञानिक क्रिया है. उसमें अभिषेक से पहले विभिन्न क्रियाओं के द्वारा उर्जाओं का शोधन करके सभी चक्रों को संतुलित कर लिया जाता है. तब वे उर्जायें ग्रहण करने के लिये तैयार हो जाते हैं. अभिषेक के दौरान मंत्रों के बीच श्रंगी से निकल रही धारा shivling के शिखर से टकराकर बहुत बड़ी तादाद में सकारात्मक उर्जायें पैदा करती हैं. जिसका लाभ कई किलोमीटर के दायरे में लिया जा सकता है.राहु केतु की शांति होती है..
रुद्राभिषेक के दौरान रुद्री पाठ के अलावा कोई दूसरी आवाज नही सुनाई देनी चाहिये.

शिवलिंग का अर्थ :-

शिवलिंग भगवान शिव की रचनात्मक और विनाशकारी दोनों ही शक्तियों को प्रदर्शित करता है. शिवलिंग का अर्थ होता है ”सृजन ज्योति” यानी भगवान शिव का आदि-अनादि स्वरूप. सूर्य, आकाश, ब्रह्माण्ड, तथा निराकार महापुरुष का प्रतीक होने का कारण ही यह वेदानुसार ज्योतिर्लिंग यानी ‘व्यापक ब्रह्मात्मलिंग’ जिसका अर्थ है ‘व्यापक प्रकाश’. शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है. शिवलिंग कहलाया. शिवलिंग का आकार-प्रकार ब्राह्मण्ड में घूम में रही आकाश गंगा के समान ही है. यह shivling हमारे ब्रह्माण्ड में घूम रहे पिंडो का एक प्रतीक ही है .

शिवलिंग का प्रकार


1 . देव लिंग :-

जिस शिवलिंग को दवाओं द्वारा स्थापित किया हो उसे देव लिंग के नाम से पुकारा जाता है वर्तमान में मूल एवं परम्परिक रूप से इस प्रकार के शिवलिंग देवताओ के लिए पूजित है

2 . असुर लिंग :-

असुरो द्वारा जिस शिवलिंग की पूजा की जाती वह असुर लिंग कहलाता था. रावण ने भी ऐसे ही एक शिवलिंग की स्थापना करी थी. रावण की तरह ही अनेक असुर थे जो भगवान शिव के भक्त थे और भगवान शिव कभी अपने भक्तो में भेदभाव नहीं करते.

3 . अर्श लिंग :-

पुराने समय में ऋषि मुनियों द्वारा जिन शिवलिंगों की पूजा की जाती थी वे अर्श लिंग कहलाते थे .

4 . पुराण लिंग :-

पौराणिक युग में व्यक्तियों द्वारा स्थापित किये गए शिवलिंगों को पुराण लिंग के नाम से जाना गया.

5 . मानव शिवलिंग :-

वर्तमान में मानवों द्वारा निर्मित भगवान शिव के प्रतीक शिवलिंग ,मानव निर्मित शिवलिंग कहलाए.

6 .स्वयम्भू लिंग :-

भगवान शिव किसी कारण जिस स्थान पर स्वतः ही लिंग के रूप में प्रकट हुए इस प्रकार के shivling स्वम्भू लिंग
किस देवता ने की कोन से shivling की उपासना ।

सृष्टि के आरम्भ से ही ब्रह्मा आदि सभी देवता, रामावतार में भगवान श्रीराम, ऋषि-मुनि, यक्ष, विद्याधर, सिद्धगण, पितर, दैत्य, राक्षस, पिशाच, किन्नर आदि विभिन्न प्रकार के शिवलिंगों का पूजन करते आए हैं। जहां shivling की उपासना से देवताओं को स्वर्ग का राज्य, कुबेर को लंका का निवास, मन के समान वेगशाली पुष्कर विमान, लोकपाल का पद तथा राज्य-सम्पत्ति प्राप्त हुई; मार्कण्डेय, लोमश आदि ऋषियों को दीर्घ आयु, ज्ञान आदि की प्राप्ति हुई; वहीं पृथ्वी पर राजाओं ने शिवपूजन से अष्ट सिद्धि नवनिधि के साथ चक्रवर्ती साम्राज्य प्राप्त किया । इसलिए लिंग के रूप में सदैव भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए ।

लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में भगवान विष्णु व ऊपरी भाग में प्रणव रूप में भगवान शिव विराजमान रहते हैं । लिंग की वेदी पार्वती हैं और लिंग महादेव हैं । जो वेदी के साथ लिंग की पूजा करता है उसने शिव और पार्वती का पूजन कर लिया । देवताओं के द्वारा विभिन्न प्रकार के shivling का पूजन ब्रह्माजी की आज्ञा से विश्वकर्मा ने विभिन्न पदार्थों से शिवलिंगों का निर्माण कर देवताओं को दिए ।

सोना, हीरा, पन्ना, नीलम, अष्टधातु और पीतल का shivling किस देवता ने की किस प्रकार के शिवलिंग की पूजा विष्णु ने सदा नीलकान्तमणि (नीलम) से बने लिंग की पूजा की; इन्द्र ने पद्मरागमणि (पुखराज) से निर्मित लिंग की; कुबेर ने सोने के लिंग की; विश्वेदेवों ने चांदी के shivling की; वसुओं ने चन्द्रकान्तमणि से बने लिंग की; वायु ने पीतल से बने लिंग की; अश्विनीकुमारों ने मिट्टी से बने लिंग की; वरुण ने स्फटिक के लिंग की; आदित्यों ने तांबे से बने लिंग की;

सोमराट् ने मोती से बने लिंग की अनन्त आदि नागों ने प्रवाल (मूंगा) निर्मित लिंग की; दैत्यों और राक्षसों ने लोहे से बने लिंग की; चामुण्डा आदि सभी मातृशक्तियों ने बालू से बने लिंग की; यम ने मरकतमणि (पन्न) से बने लिंग की; रुद्रों ने भस्मनिर्मित लिंग की; लक्ष्मी ने लक्ष्मीवृक्ष बेल से बने लिंग की; गुह ने गोयम (गोबर) लिंग की; मुनियों ने कुश के अग्रभाग से निर्मित लिंग की; वामदेव ने पुष्पलिंग की; सरस्वती ने रत्नलिंग की; मन्त्रों ने घी से निर्मित लिंग की; वेदों ने दधिलिंग की; और पिशाचों ने सीस से बने लिंग की पूजा की ।

विभिन्न प्रकार के shivling की पूजा का फल सुन्दर घर, बहुमूल्य आभूषण, सुन्दर पति/पत्नी, मनचाहा धन, अपार भोग और स्वर्ग का राज्य—ये सब शिवलिंग की पूजा के फल हैं ।

शिवोपासना करने वाले मनुष्य की न तो अकालमृत्यु होती है और न सर्दी या गर्मी आदि से ही उसकी मृत्यु होती है । लिंग विभिन्न वस्तुओं से बनाए जाते हैं और उनके पूजन का फल भी अलग होता है अत: अपनी मनोकामना के अनुसार shivling का चयन कर पूजन करना चाहिए । दो भाग कस्तूरी, चार भाग चंदन तथा तीन भाग कुंकुम से गंध लिंगबनाया जाता है । इसकी पूजा से शिव सायुज्य की प्राप्ति होती है । सुगन्धित पुष्पों से पुष्प लिंग बनाकर पूजा करने से राज्य की प्राप्ति होती है । बालु से ‘बालुकामय लिंग’ बनाकर पूजन करने से व्यक्ति शिव सायुज्य पाता है ।

आरोग्य लाभ के लिए मिश्री से ‘सिता खण्डमय लिंग’ का निर्माण किया जाता है । हरताल, त्रिकटु को लवण में मिलाकर ‘लवणज लिंग बनाया जाता है। यह वशीकरण करने वाला और सौभाग्य देने वाला है । भस्ममय लिंग सर्वफल प्रदायक माना गया है । जौ, गेहूँ और चावल के आटे का बने यव गोधूम शालिज लिंग के पूजन से स्त्री, पुत्र तथा श्री सुख की प्राप्ति होती है । तिल को पीस कर तिलपिष्टोत्थ लिंग बनाया जाता है । यह मनोकामना पूर्ण करता है । गुडोत्थ लिंग प्रीति में बढ़ोतरी करता है । वंशांकुर निर्मित लिंग बांस के अंकुर से बनाया जाता है । इससे वंश बढ़ता है ।

शिवलिंग क्या है और कैसे बना

केशास्थि लिंग शत्रुओं का नाश करता है । दूध, दही से बने shivling का पूजन कीर्ति, लक्ष्मी और सुख देता है । रत्ननिर्मित लिंग लक्ष्मी प्रदान करने वाला है । पाषाण लिंग समस्त सिद्धियों को देने वाला है । धातुनिर्मित लिंग धन प्रदान करता है । काष्ठ लिंग भोगसिद्धि देने वाला है । दूर्वा से बना लिंग अकालमृत्यु का नाश करता है । कर्पूरज लिंग मुक्ति देने वाला है । मौक्तिक लिंग सौभाग्य देने वाला है । स्वर्ण लिंग महामुक्तिप्रद है । धान्यज लिंग धान्य देने वाला है ।

फलोत्थ लिंग फलप्रद है । नवनीत लिंग कीर्ति और सौभाग्य देने वाला है । धात्रीफल (आंवला) से बना लिंग मुक्ति देने वाला है। पीतल और कांसे का लिंग मुक्ति देने वाला है । सीसे का लिंग शत्रुनाशक है । अष्टधातुज लिंग सर्वसिद्धि देने वाला है । स्फटिक लिंग सर्वकामप्रद होता है ।

मिट्टी से बना पार्थिव लिंग सभी सिद्धियों को देने वाला और शिवसायुज्य को देने वाला है । पारद लिंग का सबसे अधिक माहात्म्य है। ‘पारद’ शब्द में प=विष्णु, आ=कालिका, र= शिव, द= ब्रह्मा—ये सब स्थित होते हैं। पारदलिंग की एक बार भी पूजा करने से धन, ज्ञान, सिद्धि और ऐश्वर्य मिलते हैं । नर्मदा नदी के सभी कंकर ‘शंकर’ माने गए हैं। इन्हें नर्मदेश्वर या बाणलिंग भी कहते हैं।

लिंगार्चन में बाणलिंग का अपना अलग ही महत्व है। यह हर प्रकार के भोग व मोक्ष देने वाला है। कलियुग में इन चीजों से बने शिshivling की पूजा का है निषेध तांबा, सीसा, रक्तचंदन, शंख, कांसा, लोहा—इनसे बने लिंगों की पूजा कलियुग में वर्जित है ।

अपनी कामना के अनुसार करें shivling का चयन शिव की उपासना में जहां रत्नों व मणियों से बने लिंगों की पूजा में अपार वैभव देखने को मिलता है, वहीं मिट्टी से shivling बनाकर केवल, जल, चावल और बिल्वपत्र अर्पित कर देने व ‘बम-बम भोले’ कहने से ही शिव कृपा सहज ही प्राप्त हो जाती है।