नव संवत्सर 2079 क्या है|हिन्दू नव वर्ष 2079 कब है?

नव संवत्सर 2079
संवत्सर क्या है? चैत्र नवरात्रि क्या है?
(वेदों का नजरिया)
नए संवत्सर का फल कथन

नवम आयाम रन्ध्र या कमी है जिसके कारण नयी सृष्टि होती है, अतः नव का अर्थ नया, 9-दोनों है-
नवो नवो भवति जायमानो ऽह्ना केतुरूपं मामेत्यग्रम्। (ऋक् ) = नव (9) से नया उत्पन्न होता है। दिनों के आरम्भ का सूचक (केतु) उषा पहले होता है।

नव संवत्सर 2079


सृष्टि का स्रोत अव्यक्त है, उसे मिलाकर सृष्टि के 10 स्तर हैं , जिनको दश-होता, दशाह, दश-रात्रि आदि कहा गया है-
यज्ञो वै दश होता। (तैत्तिरीय ब्राह्मण ) = यज्ञ 10 होता (निर्माता) है।

विराट् ही यज्ञ है। विराट् के 10 अक्षर हैं।
विराट् एक छन्द है जिसके प्रति पाद में १० अक्षर हैं।

अन्तो वा एष यज्ञस्य यद् दशममहः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण)= इस यज्ञ का अन्त है जो 10 वां दिन है।
अथ यद् दशरात्रमुपयन्ति। विश्वानेव देवान्देवतां यजन्ते। (शतपथ ब्राह्मण )=अब जो 10 रात्रि तक चलता है उसमें सभी देव देवों का यजन करते हैं (पुरुष सूक्त १५ में-देवों ने पुरुष पशु से विश्व की सृष्टि की)

प्राणा वै दशवीराः।
= प्राण ही 10 वीर हैं
. मुख्य नवरात्र-वर्ष के 360 दिनों में 40 नवरात्र होंगे। अतः यज्ञ के वेद यजुर्वेद में 40 ग्रह हैं (ग्रह = जो ग्रहण करे)-यद् गृह्णाति तस्माद् ग्रहः। (शतपथ ब्राह्मण १०/१/१/५)

षट् त्रिंशाश्च चतुरः कल्पयन्तश्छन्दांसि च दधत आद्वादशम्।
यज्ञं विमाय कवयो मनीष ऋक् सामाभ्यां प्र रथं वर्त्तयन्ति। (ऋक् १०/११४/६)
= 36 और 4 प्रकार के ग्रह (सोम-पात्र) में 12 प्रकार के छन्द (सीमाबद्ध) होते हैं।

40 नवरात्रके लिये महाभारत में युद्ध के बाद 40 दिन का शोक बनाया गया था, जो आज भी इस्लाम में चल रहा है।
आजकल वर्ष में चन्द्रमा की 13 परिक्रमा के लिये 13 दिन का शोक मनाते हैं। (तेरहवीं)

40 नवरात्रों में 4 मुख्य हैं-

(१) दैव नवरात्र-उत्तरायण के आरम्भ में जो प्रायः 22 दिसम्बर को होता है। भीष्म ने इसी दिन देह त्याग किया था।
(२) पितर नवरात्र-दक्षिणायन आरम्भ-प्रायः 23 जून को।
(३) वासन्तिक नवरात्र-उत्तरायण में जब सूर्य विषुव रेखा पर हो।
(४) शारदीय नवरात्र-दक्षिणायन मार्ग में जब सूर्य विषुव रेखा पर हो।-ये दोनों मानुष नवरात्र हैं।
सभी नवरात्र इन समयों के चान्द्र मास के शुक्ल पक्ष में होते हैं-पौष, आषाढ़, चैत्र, आश्विन।

नव संवत्सर…
कार्त्तिक की नव रात्रि-आकाश में ग्रह गति जानने के लिये क्रान्तिवृत्त है जो सूर्य के चारों तरफ पृथ्वी कक्षा के तल में है। पृथ्वी की घूर्णन गति जानने के लिये या सूर्य की पृथ्वी सतह पर उत्तरायण या दक्षिणायन जानने के लिये विषुव वृत्त है जो विषुव रेखा का अनन्त गोले की सतह पर प्रक्षेप है। उसी सतह पर क्रान्ति वृत्त भी है। दोनों परस्पर को २ विन्दुओं पर काटते हैं। यह किसी ग्लोब पर देखा जा सकता है। जिस विन्दु पर क्रान्तिवृत्त विषुव वृत्त से ऊपर उठता हुआ दीखता है, वहां सूर्य आने से विषुव संक्रान्ति होती है। जिस चान्द्र मास में यह संक्रान्ति होती है उससे वर्ष आरम्भ होता है।

यहां पर दो रेखायें एक दूसरे को कैंची की तरह काटती हैं, अतः इस विन्दु को कृत्तिका (कैंची) कहते हैं। कलियुग आरम्भ में तथा उससे २६,००० वर्ष पूर्व यह विन्दु वहीं था जहां आकाश में कृत्तिका नक्षत्र दीखता है। वह पूर्व पुरुष (जिससे सभ्यता आरम्भ हुई) स्वायम्भुव को मनु कहते हैं। उसके ७१ युगों को मन्वन्तर कहते हैं।

ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२९)-त्रीणि वर्ष शतान्येव षष्टिवर्षाणि यानि तु। दिव्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्त्तितः॥१६॥
= ३६० मनुष्य (सौर) वर्षों का १ दिव्य सम्वत्सर होता है।
एवं पञ्चवर्षस्य युगस्यादिः संवत्सरः’
अर्थात्
पाँच वर्षों के युग के प्रथम वर्ष का आरम्भ सम्वत्सर से है ।

Chaitra Navratri- नव +नव रूप मे शक्ति उपासना

‘वसन्त ऋतूनाम् ‘
अर्थात्
ऋतुओं में प्रथम स्थानीय ऋतु वसन्त है ।

‘माघो मासानाम् ‘
अर्थात्
प्रथमस्थानीय मास माघ है।

‘पक्षाणां शुक्लः ‘
अर्थात्
पक्षों में प्रथमस्थानीय पक्ष शुक्ल है।

‘अयनयोरुत्तरम् ‘
अर्थात्
अयनों में उत्तर अयन प्रथम है।

‘दिवसानां शुक्लप्रतिपत् ‘
अर्थात्
दिवसों में प्रथमस्थानीय दिवस शुक्ल प्रतिपदा वाला है ।

‘मुहूर्तानां रौद्रः’
अर्थात्
मुहूर्त्तों में प्रथमस्थानीय मुहूर्त्त रौद्र है।

‘करणानां किंस्तुघ्नः’
अर्थात्
करणों (तिथ्यर्द्ध) में प्रथमस्थानीय करण किंस्तुघ्न है। आथर्वण ज्योतिष में इसे कौस्तुभ कहा गया है।


‘ग्रहाणां ध्रुवः”
अर्थात्
ग्रहों (खगोलीय पिण्डों) में प्रथमस्थान ध्रुव तारा का है ।


एवं पञ्चवर्षस्य युगस्यादिः संवत्सरः’
अर्थात्
पाँच वर्षों के युग के प्रथम वर्ष का आरम्भ सम्वत्सर से है ।
‘वसन्त ऋतूनाम् ‘

अर्थात्
ऋतुओं में प्रथम स्थानीय ऋतु वसन्त है ।
‘माघो मासानाम् ‘

अर्थात्

प्रथमस्थानीय मास माघ है।

‘पक्षाणां शुक्लः ‘
अर्थात्
पक्षों में प्रथमस्थानीय पक्ष शुक्ल है।

‘अयनयोरुत्तरम् ‘
अर्थात्
अयनों में उत्तर अयन प्रथम है।

‘दिवसानां शुक्लप्रतिपत् ‘
अर्थात्
दिवसों में प्रथमस्थानीय दिवस शुक्ल प्रतिपदा वाला है ।

‘मुहूर्तानां रौद्रः’
अर्थात्
मुहूर्त्तों में प्रथमस्थानीय मुहूर्त्त रौद्र है।

‘करणानां किंस्तुघ्नः’
अर्थात्
करणों (तिथ्यर्द्ध) में प्रथमस्थानीय करण किंस्तुघ्न है। आथर्वण ज्योतिष में इसे कौस्तुभ कहा गया है।

‘ग्रहाणां ध्रुवः”
अर्थात्
ग्रहों (खगोलीय पिण्डों) में प्रथमस्थान ध्रुव तारा का है ।


मेषादि राशिमाला का प्रथम बिंदु होने से यह सौर नव वर्ष होता है जिसे सतुवानि के रूप में भोजपुरी क्षेत्र में मनाया जाता है तो तमिलनाडु में नववर्ष के रूप में। पञ्जाब में बैसाखी के रूप में मनाया जाता है।

रबी की सस्य के अन्न से जुड़े इस पर्व में जौ, चना इत्यादि का सत्तू ग्रहण करने का पूरब में प्रचलन है।
तब युगादि वर्ष प्रतिपदा क्या थी?
नाम से ही स्पष्ट है – चंद्र मास का पहला दिन अर्थात वह नववर्ष चंद्र-सौर पञ्चांग से है। दोनों में क्या समानता है या दोनों कैसे सम्बंधित हैं?


उत्तर है कि दोनों वसंत विषुव के दिन के निकट हैं जब कि सूर्य ठीक पूरब में उग कर ठीक पश्चिम में अस्त होते हैं। यह 20 मार्च को पड़ता है, उसके निकट की पूर्णिमा को चंद्र चित्रा पर होते हैं तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा चंद्र-पञ्जाङ्ग से नववर्ष होती है।
ऐतरेय ब्राह्मण में हेमंत एवं शिशिर को मिला दिया गया है:


हेमन्‍तशिशिरयो: समासेन तावान्‍संवत्सर: संवत्सर: प्रजापति: प्रजापत्यायतनाभिरेवाभी राध्नोति य एवं वेद।
आजकल के आधे कार्त्तिक से आधे फाल्गुन तक के इस कालखण्‍ड में माघ महीना पड़ता है जो कभी संवत्सर का आरम्भ मास था, वही शीत अयनांत वाली उत्तरायण अवधि जिसे अब लोग संक्रांति के रूप में मनाते हैं। मैं संवत्सर में जिस दिन संवत्सर का प्रवेश होता है वह उस दिन का राजा होता है इस बार संवत्सर का प्रवेश शनिवार को हो रहा है और जिस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है उस दिन का बार ही उस संवत्सर का मंत्री होता है इस बार सूर्य गुरुवार को प्रवेश कर रहे हैं तो मंत्री गुरु होंगे


चैत्र शुक्ल प्रतिपदा गुड़ी पड़वा पर 2 अप्रैल को हिन्दू नववर्ष विक्रम संवत् 2079 का आरंभ होगा।
संवत्सर जम्बूद्वीप यानि भारतीय उपमहाद्वीप में कई संवत्‌ प्रचलन में दो संवत्‌ अधिक प्रख्यात , पहला, विक्रम संवत्‌, दूसरा शक संवत्‌। इनके अलावा एक और संवत्सर प्रचलित है.
( 41 से 60)रूद्रविंशति होते हैI इस संवत्सर का नाम आनल, विविध धान्यों कि वृद्धि|
राजा शनि एवं मंत्री पद गुरु बृहस्पति.


संवत्सर साधारण एवं सामान्य शुभ फलप्रदायक होगा। अतः आम जन मानस के बहुत प्रभाव बढ़ाने संवत्सर के रूप देख सकते हैं । इस बार 4 दीर्घ फल देने वाले ग्रहों का संधि काल भी होगा.. जिस तरह किसी भी रोग संधि काल में सबसे ज्यादा प्रभावी होते हैं..इसलिए सूर्य उपासना देवी उपासना ही संधि काल में की जाती है.

अप्रैल का माह ओर नव संवत्सर में चार ग्रहों का संधि काल निश्चित ही बहुत ज्यादा प्रभावी होगा चारों ग्रहों का संबंध आयु विशेष से भी होगा जहां गुरु जीव कारक होंगे नवीन को मीन मे धारण करेंगे वही राहु का मेष राशि में संबंध होगा, वहीं पर शनि जो कि जनसमुदाय को बदलने वाले होते हैं उनका भी प्रभाव दिखाई देगा, केतु किसी चीज का समूल नष्ट कर देता है उसका भी प्रभाव दिखाई देगा..
तो क्या 4 ग्रहों का बदलाव नव संवत्सर में जन समुदाय में बदलाव लाने वाला होगा???
निश्चित होगा इस ग्रहों का प्रभाव उम्र के अनुसार भी पड़ेगा..


यह बहुत ज्यादा हर वर्ष से अलग संवत्सर भी होगा जैसे गंड मूल को भी संधि काल में ज्यादा प्रभावी मांगते हैं वैसे ही इस संवत्सर का फल भी बहुत कठिन ही होगा
वर्ष का मंत्रिमंडल
मंत्री मंडल में पांच प्रमुख ग्रह शामिल है। पिछले लगभग 100 वर्षों में 10 बार से लेकर 15 बार शनी ही राजा बन रहे हैं..
राजा शनि मंत्री गुरु… गुरु आगे राजा पीछे चलेंगे
राजा होने के साथ शनि का तीन प्रमुख विभागों पर आधिपत्य भी रहेगा।10 विभागों में राजा एवं मंत्री सहित 5 विभाग पाप ग्रहों के पास तथा 5 विभाग शुभ ग्रहों के पास रहेगा |

परिषद के पद भार
 राजा-शनि,
मन्त्री-गुरु,
सस्येश-सूर्य ,
दुर्गेश-बुध,
धनेश-शनि,
रसेश-मंगल,
धान्येश-शुक्र ,
नीरसेश-शनि,
फलेश-बुध,
मेघेश-बुध  होंगे |

साथ ही संवत्सर का निवास कुम्हार का घर एवं समय का वाहन घोड़ा होगा | इस वर्ष
संवत्सर का निवास कुम्हार के घर होगा… जो नए क्रिएशन को बताएगा..

संवत्सर का समय का वाहन खड़ा होगा जो तेज गति से अपने प्रभाव को रखेगा..उस वर्ष तेज गति से वायु,
भूकंप
चक्रवात,भूस्खलन
तूफान, आदि से वाहनों के वायुयान समुद्री जहाज का नुकसान होने की भी संभावना हो जाती है।

संवत्सर का फल कथन

शनि प्रधान नव वर्ष में महंगाई बढ़ेगी। धान्य ओर बारिश की स्थिति अनुकूल रहने वाली है। आम जन मानस के बहुत सहयोगी संवत्सर के रूप इस संवत्सर की गणना नही की जायेगी।धान्य उत्पादन प्रभावित होगा। हालांकि बारिश की स्थिति अनुकूल रहने वाली है। इससे देश के कुछ राज्यों में गेहूं सहित अन्य धान्यों की प्रचुर पैदावार होगी. नल संवत्सर का प्रभाव होगा

सामाजिक स्थिति

कट्टरपंथी लोगों के द्वारा जनता एवं समाज में तीव्रता, जन आंदोलन की स्थिति बन सकती है. सरकारी संस्थाओं द्वारा किया गया कार्य- योजना भ्रष्टाचार रहित जनता के हित में होगा परंतु आम जन राजनीतिज्ञों के कारण से हिंसा भी भड़क सकती है । शासन तंत्र अपना कार्य जिम्मेदारी से सफल होगा तथा धार्मिक क्रिया कलापों अत्याधिक वृद्धि होगी |

स्वास्थ्य

करोना कॉल की चुनौतियों से जूझता विश्व सहित भारत वर्तमान में अचानक समस्याएं विकट होती दिख रही है। जल से संबंधित बीमारियां और युद्ध जैसे खतरनाक मेष के मंगल सेनापति के रूप में राहु का प्रभाव दिखाएंगे भारत मे अचानक प्राकृतिक आपदाओं के दुष्प्रभाव दिखेगा। विदेश से भी काफी सहायता लेना पड़ सकती है..

आपदा

प्राकृतिक रूप से समुद्र के किनारे वाले स्थान ज्यादा प्रभावित होंगे पूर्व उत्तर और दक्षिण पश्चिम का क्षेत्र ज्यादा प्रभावी होगा
इस वर्ष गर्मी ओर ग्लैशियर का तीव्रता के साथ पिघलना समुद्र के किनारे के शहरों के लिए अत्यधिक खतरा उत्पन्न हो सकता है.. बड़ी-बड़ी इमारतें आग का भयंकर दुष्प्रभाव देखने को मिल सकता है। इस संवत्सर में मानव बम, आयुधों, हथियारों का व्यापार एवं प्रयोग बढ़ेगा। इस संवत्सर में मेष का राहु देशों के बॉर्डर पर एक दीवार खड़ी करता नजर आएगा युद्ध या युद्ध जैसी स्थितियां अचानक बढ़ेंगी। दुष्ट प्रकृति के लोगो का प्रभाव बढ़ेगा।
वर्ष के राजा शनि देव के होने से गलत काम करने वालों को , नीचे के श्रमिक वर्ग है उनका सामूहिक रूप से जन आंदोलन बहुत बड़े रूप में बाहर आयेगा.

राजनीतिक

निश्चित पांच राज्यों को खतरा है सत्ता पलटने का या किसी बड़े राजनैतिक व्यक्ति की मृत्यु का बहुत ज्यादा संकेत मिलता है. इस संवत्सर में राजा को अपने मंत्रिमंडल की सलाह मानना बहुत जरूरी है नहीं तो राजा अकेला पड़ जाएगा..

विदेश

भारत के संबंध विदेश से काफी सुधरेंगे फिर भी कुछ देशों के द्वारा विरोध किया जाएगा,, भारत को अपनी अर्थव्यवस्था ठीक करने के लिए बहुत सारे समझौते विभिन्न देशों से करना पड़ेगा हो सकता है कि अपने सोने को भी गिरवी रख ना पड़ जाए.. विश्व के अनेक देशों में आंतरिक समस्याएं गंभीर रूप से प्रभाव छोडेंगी। कर्म की प्रधानता में वृद्धि होगी। विश्व में भुखमरी, धन के क्षति, बीमारियों एवं प्राकृतिक दुर्घटनाओं के कारण लोग को पलायन करना पड़ेगा.. सुरक्षा व्यवस्था में कमी होगी तथा त्राहि की स्थिति बनेगी।
आम जनमानस, समाज, राष्ट्र, बाजार तथा मौद्रिक नीति पर ज्यादा असर होगा..अंजना

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