Chaitra Navratri 2022- नव +नव रूप मे शक्ति उपासना

Chaitra Navratri -नवरात्रों में कैसे बदलें ब्रह्मांड की ऊर्जा को अपनी ऊर्जा में एक विशिष्ट समय होता है। यह वह अवसर होता है जब ब्रह्माण्ड में असंख्य प्रकाश धाराएँ हमारे ‘सौर मण्डल’ पर झरती हैं। ये प्रकाश धाराएँ एक दूसरे को काटते हुए अनेकानेक त्रिकोणाकृतियां बनाती हैं और एक के बाद एक अंतरिक्ष में विलीन होती रहती हैं। ये त्रिकोणाकृतियां बड़ी ही रहस्यपूर्ण होती है। ये भिन्न-भिन्न वर्ण, गुण, धर्म की होती हैं।

हिरण्यगर्भ संहिता के अनुसार ये प्रकाश धाराएँ ‘ब्रह्माण्डीय ऊर्जाएं’ हैं। ये हमारे सौर मण्डल में प्रवेश कर और विभिन्न ग्रहों, नक्षत्रों, तारों की ऊर्जाओं से घर्षण करने के बाद एक विशिष्ट प्रभा का स्वरुप धारण कर लेती हैं। 

वैदिक विज्ञान के अनुसार ये दैवीय ऊर्जाएं हैं जो ‘इदम्’ से निकल कर ‘ईशम’ तक आती हैं। अध्यात्म शास्त्र में ‘इदम्’ को ‘परमतत्व’ कहा गया है। ‘ईशम’ का अर्थ है–‘इदम’ का #साकार रूप। अर्थात् इदम् निर्विकार, निर्गुण, निराकार अनन्त ब्रह्मस्वरुप है और ईशम है सगुण, साकार, ईश्वररूप।

ये ऊर्जाएं फिर ईशम से निकल कर अपने को तीन तत्वों में विभक्त कर लेती हैं। ये तत्व हैं–अग्नि, आप (जल) और आदित्य। आदित्य भी अपने को तीन तत्वों में विभक्त कर लेता है। ये तत्व है–आकाश, वायु और पृथ्वी। इस प्रकार पांच रूप (अग्नि, जल, वायु, आकाश और पृथ्वी)-ये पंचतत्व के रूप में जाने गए हैं। शोध और अनुसन्धान के द्वारा आज यह स्पष्ट रूप से सिद्ध हो चुका है कि ‘तत्व’ ही ऊर्जा रूप में बदल जाता है। तत्व ही ऊर्जा है और ऊर्जा ही तत्व है। इन ऊर्जाओं के गुण-धर्म अलग-अलग होते हैं। आज का विज्ञान इन्हें ही  ‘इलेक्ट्रॉन’, ‘प्रोटॉन’ और न्यूट्रॉन के नाम से पुकारता है।

ज्योतिष के हिसाब से ये ही ज्ञानशक्ति, बलशक्ति और क्रियाशक्ति हैं। कालांतर में उपासना पद्धति विकसित होने पर उपासना प्रसंग में ये ही महासरस्वस्ती, महालक्ष्मी और महाकाली के रूप में स्वीकार की गयीं। महादुर्गा इन तीनों शक्तियों का सम्मलित स्वरूप है। इन तीनों शक्तियों के वाहक रूप में क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश की कल्पना की गयी। इन्हें तंत्र में पंचमुंडी आसन कहा गया है।

हिरण्यगर्भ संहिता के अनुसार ये पांचों ऊर्जाएं सौर मण्डल में प्रवेश कर ‘सौरऊर्जा’ का रूप धारण कर लेती हैं तथा नौ भागों में विभाजित हो जाती हैं और नौ मंडलों का अलग-अलग निर्माण कर लेती हैं।

पृथ्वी का जो चुम्बकत्व है और उसके कण-कण को प्रभावित करता है, वह ब्रह्माण्ड से आने वाले शक्ति-तत्व के प्रवाह के कारण है। वह शक्ति-प्रवाह अति रहस्यमय है। मेरुदण्ड में स्थित सुषुम्ना नाड़ी में यह शक्ति-प्रवाह कार्य करता है। दूसरे शब्दों में यही शक्ति-तत्व जीवन-तत्व है। यह शक्ति-तत्व-प्रवाह उत्तरी ध्रुव की ओर से आता है और दक्षिण की ओर से बाहर निकल जाता है। इसीलिए उत्तरी-दक्षिणी दोनों ध्रुव-क्षेत्र होने पर भी दोनों के गुण-धर्म में भिन्नता है। दोनों की विशेषताओं में काफी अन्तर है।

Chaitra Navratri Kab Se Start Hai

मार्च/अप्रैल और सितम्बर/ अक्टूबर अर्थात् चैत्र और आश्विन माह में जब पृथ्वी का अक्ष सूर्य के साथ उचित कोण पर होता है, तो उस समय पृथ्वी पर अधिक मात्रा में मेरुप्रभा झरती है जबकि अन्य समय पर गलत दिशा होने के कारण वह मेरुप्रभा लौट कर ब्रह्माण्ड में वापस चली जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वह मेरुप्रभा में नौ प्रकार के उर्जा-तत्व विद्यमान हैं। प्रत्येक ऊर्जा तत्व अलग-अलग विद्युत् धारा के रूप में परिवर्तित होता है।

वे नौ प्रकार की  विद्युत् धाराएँ जहाँ एक ओर प्राकृतिक वैभव का विस्तार करती हैं, वहीँ दूसरी ओर समस्त जीवधारियों, प्राणियों में जीवनी-शक्ति की वृद्धि और मनुष्यों में विशेष चेतना का विकास करती हैं। भारतीय संस्कृति और साहित्य में उन नौ प्रकार की विद्युत् धाराओँ की परिकल्पना नौ देवियों के रूप में की गयी है। प्रत्येक देवी एक विद्युत् धारा की साकार मूर्ति है।

देवियों के आकार-प्रकार, रूप, आयुध, वाहन आदि का भी अपना रहस्य है जिनका सम्बन्ध इन्ही ऊर्जा तत्वों से समझना चाहिए। ऊर्जा तत्वों और विद्युत् धाराओं की गतविधि के अनुसार प्रत्येक देवी की पूजा-अर्चना का एक विधान है और इसके लिए नवरात्र की योजना है। प्रत्येक देवी की एक रात्रि होती है। रात्रि में ही देवी की पूजा-अर्चना का विधान होता है क्योंकि मेरुप्रभा दिन की अपेक्षा रात्रि को अधिक सक्रिय रहती है।   

ब्रह्मांड यूनिवर्सल एनर्जी का आवाहन करके हम

ब्रह्मांड के घटना वाली हर घटना से शक्ति से है जो कि ऊर्जा के रूप में बदल जाती है।  ब्रम्हांड स्पेस और टाइम के अनुसार ऊर्जा बदलकर हमे प्राप्त होती है।

शक्ति संचय के साथ हम अपनी उर्जा को खत्म ना होने दें एक निश्चित लक्ष्य पर रखकर एकाग्रता में दिव्य शक्तियों के भंडार को समेटकर अंतर्मुखी करें यही ऊर्जासिद्धि है ।

ईश्वर कौन है?ब्रह्मा कौन है?जो पूर्ण हो और पूर्णता जिसमे हो वो ईश्वर है ।जो सृष्टि का सृजन करे और पूर्णमदा स्त्री है जो पूर्ण होकर पूर्ण को निकाल कर पूर्ण है इसलिए स्त्रियाँ सदा पूज्यनीय है और उनका सम्मान ईश्वर समान है।
जिसमें कामनाएं है वहीं सृजनात्मकता की बात करता है और सारी कामनाएं स्त्रियां करती है।
 नौ 🌹 विशिष्ट ऊर्जा को हम इस करोना काल में समझने की जरूरत है

प्रतिपदा —-

 इसे शुभेच्छा कहते है।जो प्रेमजगाती है प्रेम बिना सब साधन व्यर्थ है,अस्तु प्रेम को अबिचल अडिग बनाने हेतु “शैलपुत्री” का आवाहन पूजन किया जाता है। अचल पदार्थो मे पर्वत सर्वाधिक अटल होता है ।

1.शैलपुत्री देवी की ऊर्जा 

 हमारी स्थित उर्जा को ब्रह्मांड में स्पेस और टाइम मे यह  पोटेंशियल ऊर्जा मे बदल देती  है ,इन की आराधना से कन्वर्ट कर सकते अपनी शक्तियों को पहचान सकते है।

द्वितीया—-

धैर्यपूर्वक द्वैतबुद्धि का त्याग करके ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए “माँ ब्रह्मचारिणी” का पूजन करना चाहिए ।

 2.ब्रह्मचारिणी देवी की ऊर्जा 

  जो हम सृष्टि मे स्पेस और समय पर हम विचरण करते हैं वह इन देवी की शक्ति से हमे जो ऊर्जा मिलती है।  गतिमान शक्ति से गतिय ऊर्जा मिलती है।  

तृतीया—-

त्रिगुणातीत (सत,रज,तम से परे) होकर “माँ चन्द्रघण्टा” का पूजन करते हुए     मन की चंचलता को वश में करना चाहिए।

3.चंद्रघंटा देवी की ऊर्जा 

गतिय ऊर्जा से काइनेटिक इनर्जी से हर समय एक ध्वनि निकलती है।चाहे ब्लड हो,ह्दय,आदि। यह ऊर्जा ध्वनि ऊर्जा होती है यह सभी  स्पेश और समय के साथ हमे ब्रह्मांड से कन्वर्ट होकर मिलती है।

चतुर्थी

अन्तःकरण चतुष्टय मन ,बुद्धि ,चित्त एवं अहंकार का त्याग करते हुए मन,बुद्धि को “कूष्माण्डा देवी” के चरणों में अर्पित करें।

 4.कुष्मांडा देवी की ऊर्जा 

 इन्हें गर्भधारण से देखा जाता है यह ऊर्जा टाइम और स्पेस के यह शक्ति न्यूक्लियर एनर्जी के रूप में हमें मिलती है ।

पंचमी—-

 इन्द्रियों के पाँच विषयों   अर्थात्”शब्द,रुप,रस,गन्ध,स्पर्श” का  त्याग करते हुए “स्कन्दमाता” का ध्यान करें।

5.स्कंदमाता की ऊर्जा 

यह एक मैग्नेटिक ऊर्जा है जो भी  सृष्टिकाल मे सृजन होता है वह हमे आकर्षित करता है और यह  सबसे ज्यादा आकर्षण मां और बेटे में होता है इस एनर्जी को आकर्षण एनर्जी भी कहते हैं। उदाहरण के रूप में मछली पानी में अंडे देती है पानी ठंडा होता है परंतु दूर से आंख से वह अपने बच्चों को उर्जा दती है इसलिए देवी को मीनाक्षी भी कहा गया है। मां आपकी आंखो के द्वारा अपने बच्चो पर कृपा करती हैं ।

 इसलिए मां अपने भक्तों को एक आकर्षण की उर्जा भी प्रदान करती हैं।

षष्ठी—-                     

“काम,क्रोध,मद,मोह,लोभ एवं मात्सर्य”   का परित्याग करके “कात्यायनी” देवी का ध्यान करें ।monster energy???

6. कात्यायनी की ऊर्जा

मॉन्सटर एनर्जी  ऊर्जा राक्षसी ऊर्जा कहलाती है इसको  समाप्त करने के लिए नेगेटिविटी क़ो closed करती है.

सप्तमी—-             

 “रक्त,रस,माँस,मेदा,अस्थि,

मज्जा एवं शुक्र” इन सप्त धातुओ से निर्मित क्षण भंगुर दुर्लभ मानव देह को सार्थक करने के लिए “कालरात्रि” देवी की आराधना करें।

 7.कालरात्रि की ऊर्जा 

यह  रात्रिकालीन एनर्जी है जहां (इलेक्ट्रिसिटी) विद्युतीय  ऊर्जा होती है ।यह ऊर्जा  स्पेश व समय  पर हमे  इनकी अराधना रात्रि में करने का इसीलिए विधान है।

अष्टमी—-

ब्रह्म की अष्टधा प्रकृति

“पृथ्वी,जल,अग्नि वायु,आकाश,मन,बुद्धि एवं अहंकार” से परे “महागौरी” के स्वरुप का ध्यान करता हुआ ब्रह्म से एकाकार होने की प्रार्थना करे..

8.महागौरी की ऊर्जा

यह सोलर ऊर्जा के रूप मै एकाकर यह थर्मल एनर्जी के रूप में सभी को प्रोटेक्ट करती और एंटीबायोटिक रूप में होती है..

नवमी —-

माँ सिद्धिदात्री की आराधना से नवद्वार वाले    शरीर की प्राप्ति को धन्य बनाता हुआ आत्मस्थ हो जाय ।

 9.सिद्धिदात्री देवी की ऊर्जा 

को दो चीजों को मिलने का  टाइम के अनुसार यह न एनर्जी जीवन शक्ति के रूप में प्रभावी होती है और यह केमिकल या रसायन एनर्जी प्राप्त होती हैं।

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